लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी हैं मीसाबंदी


शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री म.प्र.शासन

                       आपातकाल के दिनों में जब मुझे जेल भेजा गया तब मेरी उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। आयु कम थी लेकिन देश की राजनैतिक स्थितियों से मैं पूरी तरह अवगत था। वैचारिक परिपक्वता नहीं थी लेकिन अच्छे-बुरे की समझ विकसित हो चुकी थी। सरकार ने विरोधी विचारधारा के लोगों को बिना प्रमाणों के कारावास में ठूँसना शुरू कर दिया।
            मैं अपने अनेक वरिष्ठ साथियों के साथ भोपाल जेल में था। आपातकाल के दौरान में जो सर्वधर्म समभाव का वातावरण निर्मित किया गया, वह मेरे जीवन का अद्भुत अनुभव और सीख है। रोज सायंकालीन प्रार्थना (संझा) होती। हम सब उसमें शामिल होते। मेरे साथ कारावास में स्व.उत्तमचंद ईसराणी जैसे समर्पित स्वयंसेवक और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी थे। उनसे मार्गदर्शन मिलता। वे हमें भागवत् गीता का उद्धरण पढ़कर सुनाते, चर्चा करते और हम सभी न्याय और सत्य की विजय की कामना करते - ''हम शायद जीवन भर काल कोठरी से नहीं निकल पायेंगे'', तब स्व.ईसराणी जी हिम्मत बढ़ाते वे कहते थे ''रात्रि के पश्चात् सूर्योदय होता ही है। हम अपने राष्ट्र के लिये इतना कष्ट तो उठा ही सकते हैं।''
                               कारावास में प्रायः अखबार पढ़ने को मिल जाया करते थे। राष्ट्रीय स्तर पर जो राजनैतितक परिदृश्य था उसमें एक ही दल का प्रभाव दिखाई देता। अखबार भी सच बता पाने में असमर्थ हो गये थे। भोपाल में श्री बाबूलाल भानपुर, श्री गुलाबचंद खण्डेलवाल, श्री तपन भौमिक आदि भी बंदी रहे। मेरे अनेक साथी डायरी भी लिखते थे। कारावास में बीते उन दिनों की यादें स्मृति पटल पर एकदम तरोताजा हैं। मुझे किशोरावस्था में ही जीवन और व्यवस्था के इस कड़वे सच का साक्षात्कार करना पड़ा। अपने उन साथियों की वेदना मुझे आज भी तकलीफ देती है जिन्होंने कारावास में अकारण अत्याचार सहे।
                               आज से 34 वर्ष पहले 25 जून को आपातकाल लागू हुआ था। भारतीय लोकतंत्र और आजाद भारत के इतिहास में आपातकाल एक ऐसा पृष्ठ है जिसे कोई पढ़ना नहीं चाहेगा। लोकतंत्र और संवैधानिक प्रक्रिया पर कुठारघात के प्रतीक आपातकाल के विरोध में संघर्ष करने वाले सभी लोग दरअसल देश की दूसरी आजादी के सम्मानित सेनानी है। आपातकाल का विरोध करने पर जेलों में निरूद्ध लोगों के संघर्ष, दुख और तकलीफों पर लिखा जाए तो एक वृहद ग्रंथ तैयार हो सकता है। देश को अंग्रेजों की दासता से आजाद कारावास अवधि और दण्ड का पता होता था लेकिन आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष के सेनानियों को तो यह भी पता नहीं था कि वे कब तक जेल में रहेंगे और उन्हें कहाँ अपील करनी होगी? इसीलिये दूसरी आजादी के संघर्ष के सेनानियों को मीसाबंदी न कहकर लोकतंत्र के सच्चे प्रहरी कहा जाना चाहिये। जिन्होंने आपातकाल के विरोध ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूती दी।
                               मेरा दृढ़ मत है कि भविष्य में यदि कभी देश की आजादी और लोकतंत्र को कोई खतरा उत्पन्न हुआ तो लोकतंत्र के इन प्रहरियों का संघर्ष लोगों को प्रेरणा देगा। मेरा यह भी मानना है कि मीसा कानून निरूद्ध लोगों के त्याग और तपस्या की क्षतिपूर्ति हो ही नहीं सकती। कम से कम ऐसे देश प्रेमियों के लिये सम्मान निधि कुछ भी नहीं हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने मीसाबंदियों को सम्मान निधि देने का फैसला लेकर उसे लागू किया है। सरकार द्वारा दी जा रही यह निधि सिर्फ एक विनम्र प्रयास है, लोकतंत्र के प्रति उनके समर्पण के सम्मान के लिये। लोकतंत्र के इन प्रहरियों का सम्मान कर मैं गौरवान्वित महसूस करता हूँ। आज अनेक मीसाबंदी दिवंगत हो चुके हैं। उनके द्वारा किये गये संघर्ष की स्मृतियाँ ही शेष हैं। अनेक लोकतंत्र के प्रहरी वृद्ध और बीमार अवस्था में हैं। आज भी ऐसे किसी प्रहरी से रू-ब-रू होता हूँ तो उसके चेहरे की झुर्रियों में उसकी जिजीविषा को पढ़ता हूँ। मीसाबंदी रूपी इन लोकतंत्र के प्रहरियों द्वारा सहे गये कष्ट उनके परिवारों के लिये किसी आपदा से कम न थे। लेकिन अन्याय का अंत हुआ और देश में लोकतंत्र ने करवट ली। मैं लोकतंत्र के प्रहरियों के इस जिद, जुनून और जज़्बे को नमन भी करता हूँ।




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