सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन


विमल चौधरी, रिटा0 कर्मचारी नेता

                               ब्रिटिश शासन की भांति फूट डालों और राज करो की कांग्रेस नीति ने भारत के सभी राज्यों पर लोकशाही के विरूद्ध नीति अपनाते हुए सारी हदें पार कर दी थी। श्रीमती इंदिरा गाँधी की तानाशाही नीतियों के कारण भारत की जनता में निरंतर आक्रोश की ज्वाला सुलगना शुरू हो चुकी थी, केवल देर थी तो उचित नेतृत्व की। ऐसे समय में बिहार से इसकी शुरूआत लोकनायक जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में हुई। जिनके नेतृत्व में सभी गैर कांग्रेसी नेताओं ने एकजुट होकर कांग्रेस एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी के प्रति जन आक्रोश को नेतृत्व प्रदान किया। इस नेतृत्व में अग्रणी लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने देश के सभी युवाओं को क्रांति में सहभागिता निभाने का आव्हान किया। जिसमें सम्पूर्ण क्रांति के नवीन नारें के साथ देश के सभी छात्रों से इसे सफल बनाने के उद्देश्य के साथ एक वर्ष तक सभी कालेजों और विश्वविद्यालयों के त्याग के रूप में बंद रखने का आव्हान किया।
तात्कालिन व्यवस्था के विरूद्ध, युवाओं में, देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन जैसे सम्मोहक नारों के प्रति युवाओं को आकर्षित करने में सभी नेतृत्व सफल रहे एवं 5 जून, 1975 को पटना शहर के गाँधी मैदान में लगभग 5 लाख युवाओं/जनसमुह की अतिउत्साही भीड़ में देश के शीर्ष नेतृत्व के साथ अतिचिंतनीय राजनैतिक गिरावट, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, कमर तोड़ मंहगाई, बेरोजगारी एवं अनुपयोगी शिक्षा पद्धति के साथ इलाहबाद से इंदिरा गाँधी के विरूद्ध चुनाव में पराजित प्रत्याशी श्री राजनारायण के द्वारा लगाये गये आरोपों को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा नकारे जाने से भी जनता में आक्रोश था। इसी के परिणाम स्वरूप लोकनायक ने उस विशाल जनसमुह को पूर्ण धैर्य रखते हुये अहिंसक क्रांति को (सम्पूर्ण क्रांति) के रूप में परिभाषित किया।
                               उस विशाल जनसमुह को संबोधित करते हुए लोकनायक ने अपनी क्रांति की परिभाषा गाँधीजी के समग्र क्रांति की विचारधारा के स्थान पर सम्पूर्ण क्रांति के शब्दों में उद्घोषणा की जिसमें उन्होंने तात्कालिक सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था के संकट को हटाने एवं राजकीय व्यवस्था, समाज की व्यवस्था को भी बदलने का आव्हान किया। जिसमें उन्होंने एक नारा तात्कालिन कुरीतियों जैसे जातपात, तिलक, दहेज और सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिये दिया था।

''जातपात तोड़ दो, दहेज प्रथा छोड़ दो,
समाज के प्रभाव को नई दिशा में मोड़ दो।''

लोकनायक जयप्रकाश की विचारधारा में सम्पूर्ण क्रांति में शामिल उद्देश्यों में राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक और अध्यात्मिक नामक क्रांतियों का समावेश है। सम्पूर्ण क्रांति के नारे में उन्होंने युवाओं में अतिजोश संचार करते हुए ततकालीन राजनैतिक सत्ता के रूप कार्यरत इंदिरा कांग्रेस को जड़मूल से उखाड़ भेंकने का आव्हान किया था। लोकनायक के शब्दों में ''सिर्फ विधान मण्डल का त्यागपत्र या मंत्री मण्डल को भंग कराया जाना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना की राजनैतिक सोच और नई व्यवस्था परिवर्तन आवश्यक है। जिसमें तात्कालिक व्यवस्थाओं में बेरोजगारी का निराकरण, शिक्षा और भ्रष्टाचार में क्रांतिकारी परिवर्तन के बिना कोई भी क्रांति सफल नहीं हो सकेगी। सम्पूर्ण क्रांति में सहयोग देने हेतु उन्होंने बिहार में पदस्थ सशस्त्र बल के साथ सीमा सुरक्षा बलों से भी इस व्यवस्था परिवर्तन में सहयोग की अपील के साथ कानूनी आदेशों की उपेक्षा/इनकार करने का आव्हान किया था।
मात्र दो दिनों में ही इस क्रांति की शुरूआत हो चुकी थी एवं आंदोलन के दौरान ही छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का गठन हो चुका था। जिसमें तात्कालिन छात्र नेता लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, शरद यादव जैसे नेताओं की अगुवाई मौजूद थी। सम्पूर्ण क्रांति की कड़ी में 7 जून, 1975 से बिहार विधानसभा में विधायकों का प्रवेश निषेध एवं विधानसभा भंग करने, पंचायत से सचिवालय स्तर तक प्रशासन को पंगु बनाने के लिये सभी स्तर पर कार्यालयों के बाहर धरना देने का अभियान प्रारंभ किया। जिसमें सम्पूर्ण भारत में छात्र युवा संदेशवाहिनी का गठन हो चुका था। 7 जून, 1975 को गाँधी मैदान में सभा के दौरान सभा स्थल पर बारह तथाकथित गोलियों से घायल कार्यकर्ताओं के आने से सभा स्थल पर तीव्र प्रतिक्रिया एवं नारेबाजी होने लगी। पटना के तात्कालिन जिला कलेक्टर विजय शंकर दुबे के अनुसार उन घायल लोगों पर तथाकथित इंदिरा बिग्रेड द्वारा बेली रोड़ स्थित मकान से गोली चालन के दौरान उन्हें घायल किया गया था और उन्हीं अपराधियों में से 6 लोगों की गिरफ्तारी से भी अवगत कराया गया था। इस गोलीबारी की घटना से आक्रोशित जनसमुह में पूर्णतः संयम रखने की अपील पर समुह द्वारा अपने आक्रोश की पीड़ा को पान करना पड़ा अन्यथा उसी दिन विद्रोह के रूप में बिहार के सभी दफ्तर, विधानसभा, सचिवालय आदि में हिंसक प्रदर्शन हो सकते थे। सभा के दौरान लोकनायक की अपील पर शांति के वचन अनुसार सभी जनसमुह ने शांति बनाये रखी। इससे लोक नायक की अगुवाई एवं आंदोलन का प्रभाव और अनुशासन परिलक्षित हुआ था।
5 जून, 1975 के आंदोलन के दौरान संघर्षशील नवयुवकों और जनता के द्वारा हस्ताक्षरित पेपरों को बण्डलों के रूप में ट्रकों में लादकर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किये गये थे। जिसमें यह स्पष्ट उल्लेख था कि वर्तमान कार्यरत सांसदों/विधायकों पर जनता विश्वास खो चुकी है और तत्काल विधानसभा भंग किये जाने की आवश्यकता दर्शित थी।
बिहार में तथा देश के कई राज्यों में जुलूस और धरनों द्वारा सत्याग्रह के रूप में एक नया आंदोलन प्रारंभ हो चुका था और उसी आंदोलन की निरंतरता में पटना के गाँधी मैदान में लोकनायक द्वारा सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया गया, जिसमें उन्होंने विधानसभा भंग करने के साथ अहिंसक एवं शांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह करने का आग्रह करते हुए 4 सुत्रीय आंदोलन की रूपरेखा अनुसार तात्कालिन विधानसभा को भंग करने हेतु सचिवालय के सभी प्रवेश द्वारों पर धरना प्रदर्शन करते हुए किसी भी सदस्य को अंदर प्रवेश न करने देना, ब्लाक स्तर से लेकर सचिवालय स्तर तक सभी प्रशासनिक व्यवस्था को पंगु बनाना तथा अपनी सभी माँगों के पूर्ण होने तक प्रदर्शन/सत्याग्रह करते हुए जेल भरो आंदोलन प्रारंभ किया गया। जिसके फलस्वरूप गठित छात्र संघर्ष समिति के सदस्यों द्वारा विधानसभा के सभी दलों के विधायकों से अपनी-अपनी सदस्यता से त्यागपत्र देने की माँग के साथ ही विधानसभा को भंग करने का एक सप्ताह के अल्टीमेटम की घोषणा की गई और साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि छात्र संघर्ष वाहिनी की माँग अनुसार सभी विधायकों ने अपने इस्तीफें राज्यपाल को नहीं सौंपें तो उनके आवास गृहों का घेराव किया जायेगा और उन्हें त्यागपत्र देने के लिये मजबूर किया जायेगा।
बिहार से शुरू हुआ आंदोलन नई ऊँचाईयों को छू रहा था और शनैःशनैः बिहार की जनता में भी नवीन जाग्रति के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा होने के आसार स्पष्टतः नजर आने लगे थे। एक और जहाँ छात्र आंदोलन दिनो दिन अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर थे, वहीं दूसरी ओर गैर कम्यूनिष्ट विपक्षी दलों में मतभिन्नता दिखलाई दी और छात्र संघर्ष समिति के द्वारा दिये गये अल्टीमेटम के बावजूद एवं पार्टी नेतृत्व के द्वारा जारी निर्देशों की अनदेखी की जाकर विधानसभा से त्यागपत्र नहीं दिया। विधानसभा से त्यागपत्र देने में अन्य पार्टियों के विधायकों में भी पार्टी निर्देशों के बावजूद भी अनिश्चितता की स्थिति बनी रही, तात्कालिन जनसंघ गुट के 50 प्रतिशत् विधायकों ने त्यागपत्र ही नहीं दिया। फलस्वरूप बिहार के ग्यारह जनसंघ गुट के विधायकों को पार्टी की सदस्यता से 6 वर्ष के निष्कासन का अप्रिय निर्णय पार्टी ने लिया। तात्कालिन संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का भी यही हाल रहा एवं उनके 13 विधायकों में से केवल 7 विधायकों ने इस्तीफें दिये। शेष अन्य पार्टी के निर्देशों की अवहेलना करते हुए मुकर गये। इसी कड़ी में कांग्रेस के सभी 23 विधायकों ने 15-16 जून, 1975 को कलकत्ता में होने वाले कांग्रेस के महाअधिवेशन तक निर्णय स्थगित रखते हुए हाईकमान के निर्देशों के अनुरूप निर्णय लिये जाने का प्रस्ताव पास किया। किन्तु उक्त तिथि बीत जाने के बाद भी बिहार के किसी भी कांग्रेस विधायक ने अपना इस्तीफा नहीं सौंपा। तात्कालिन विधानसभा अध्यक्ष हरिनाथ मिश्र के अनुसार विभिन्न पार्टियों के बिहार के केवल 19 विधानसभा सदस्यों द्वारा त्यागपत्र दिया गया था, जो उन्होंने स्वीकार भी किया था।
                               7 जून, 1975 से प्रारंभ आंदोलन और निर्धारित कार्यक्रम अनुसार सर्वोदयी नेता रामनंदन सिंह, जनसंघ के नेता विजय कुमार मिश्र तथा छात्र संघर्ष समिति के नेता विद्यानंद तिवारी अगुवाई में विधानसभा के समक्ष छात्र संघर्ष समिति, सर्वोदय मण्डल तथा गैर कम्यूनिष्ठ विपक्षी दलों के धरना कार्यक्रम के दौरान 53 सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर जेल पहुँचाया गया। इसी दिन बिहार के विभिन्न जिलों में छात्र संघर्ष समिति द्वारा छात्रों से एक वर्ष तक कालेज/विश्वविधालयों में कक्षा का बहिष्कार करते हुए सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में शामिल होने का आव्हान किया गया। जिससे राजधानी स्तर से लेकर ब्लाक स्तर तक धरना प्रदर्शन प्रारंभ हो चुके थे।
                               सम्पूर्ण क्रांति का असर पूरे भारत वर्ष में धीरे-धीरे प्रत्येक स्तर पर फैलना शुरू हो चुका था और तात्कालिन कांग्रेस सरकार के विरूद्ध जनता में आक्रोश भी प्रारंभ हो चुका था। श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाते हुए उनकी स्वयं की पार्टी के चयनीत सांसदों जिन्होंने इस आंदोलन को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने की कोशिश की उन्हें भी गिरफ्तार करने की अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई गई। इस तरह इतिहास में यह समय बदनूमा दाग के रूप में अंकित है।




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