आपातकाल का सबक


प्रस्तुति - डॉ. पुंडलिकराव निकम, खंडवा(मीसाबंदी)

                       आपातकाल में बर्बर अत्याचारो की एक लंबी श्रंखला है। भ्रष्ट एवं खुशामद खोर अधिकारी अपनी स्वामी-भक्ति के प्रदर्शन हेतु बढ़चढ़ कर अत्याचारो में लिप्त थे। हर अधिकारी दूसरे से बढ़कर बर्बरता का प्रदर्शन कर रहा था। अमानवीय यातनाओं, जुल्म सितम की इंतिहा कर देश की जनता की आवाज को कुचलने में अपनी शक्ति और सामर्थ का प्रदर्शन कर रहे थे। नाजी जुल्मो का इतिहास एवं मध्य युगीन बर्बरता की एतिहासिक कहानियाँ फीकी पढ़ने लगी थी। नए नए तरीको से अत्याचारो की नई इबारत लिखी जा रही थी। सम्पूर्ण भारत खुली जेल में तब्दील हो चुका था। पुलिस थाने एवं जेल यातना केन्द्र बन चुके थे। वरिष्ठ राजनेता एवं समाजसेवी आपातकाल की घोषणा के साथ ही गिरफ्तार कर लिए गए थे। किन्तु छात्र एवं युवा आंदोलनो में शामिल युवा नेताओ को कुछ समय बाद गिरफ्तार कर नई पीढ़ी को भविष्य का सबक सिखाने के उद्देश्य से यातना केन्द्रो में दंडित किया जा रहा था। उनके स्वाभिमान और तरुणाई को कुचल कर देश भक्ति का दण्ड दिया जा रहा था।
            मै भारतीय युवा संघ (जनसंघ का युवा संगठन) का खंडवा नगर का संगठन सचिव था। मेरे साथी ही बसंत गुप्ता एवं संतोष चौहान को गिरफ्तार कर हम तीनों युवा कार्यकर्ताओ को जबलपुर जेल भेजा गया, वहाँ श्री कैलाश सोनीजी, श्री गणेश प्रसादजी अग्रवाल, श्री शिवप्रसादजी चेनपुरिया, श्री रघु ठाकुर, श्री शरद यादवजी जेल में हमारे साथी थे। अटलजी के शब्दो में -
                               "युवक हार जाते है, लेकिन यौवन कभी न हारा
                               पल, निमिष की बात नहीं है, चिर संघर्ष हमारा
                               पृथ्वीराज की आंखे जाती, स्वप्न न उनके जाते
                               भर जाते है घाव, दाग पर अमिट सदा रह जाते"

       इतिहास गवाह है, कि आपातकाल के दौरान दबी कुचली तरुणाई आज देश की बागडोर सम्हाले हुए है। और लोकतन्त्र की रक्षा में समर्पित है।




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