क्रांति पथ

आपातकाल आजादी का शंखनाद


- नरेन्द्र सिंह तोमर (केन्द्रीय मंत्री)

                               स्वतंत्र भारत के इतिहास में 25 जून 1975 से 20 मार्च 1977 तक फैले 20 महीने, क्रूर, तानाशाही की सघन कालिमा में डूबे पड़े रहे उस कालावधि को तत्कालीन हुक्मरानों ने आपातकाल की संज्ञा प्रदान की जबकि वह भारतीय लोकतंत्र की हत्या का कुत्सित षड्यंत्र था। इस दौरान देशवासियों की मूल स्वतंत्रता एंव अधिकारों का जिस निर्लज्जता एवं धूर्तता से अपहरण किया गया, उससे देश का जनगण लहूलुहान हो गया। परंतु भारत की संघर्षशील एवं स्वाधीनता-उपासक जनता ने उस चुनौती को स्वीकार कर आपातकाल के नियंताओं को पराभूत किया और देश में दूसरी आजादी के युग का शुभारंभ भी किया।

                               आज आपातकाल के त्रासद दिनों को व्यतीत हुए तीन-साढ़े तीन दशक पूरे हो रहे हैं। किन्तु उन दिनों की लोमहर्षक स्मृतियों को क्या कभी भुलाया जा सकता है। 25 जून 1975 की स्याह रात्रि जो घटित हुआ, उसकी खबर कहीं देशवासियों को न लग जाये, इसलिये केन्द्र में पदस्थ कांग्रेस सरकार के आदेश पर अर्धरात्रि के दौरान ही समाचार-पत्रों के कार्यालय और छापाखानों की बिजली काट दी गई है। परिणामतः दूसरे दिन 26 जून को दैनिक अखबार भी अनेक स्थानों पर प्रकाशित नहीं हो सके। इस अकल्पनीय और अप्रत्याशित स्थिति में आमजन हतप्रभ रह गया। उसके सामने एक के बाद एक अनेक प्रश्न आकर खड़े हो गये। वे पूछ रहे थे- "यह यकायक क्या हो गया? अखबार क्यों नहीं निकले? और चैराहों-चैराहों पर ये पुलिस, अर्धफौजी और फौजी टुकड़ियां क्यों तैनात हैं? सरकार को किससे खतरा है- किसी बाहरी ताकत से या देश की जनता से ही? ये लाखों लोग जेलों में क्यों बंद किये जा रहे है?

                               और देखते-देखते देश का वातावरण अव्यक्त भय एवं आतंक से भर उठा। उस समय सरकारी प्रवक्ता के रूप में आकाशवाणी का स्वर घनघना उठा- ' देश की आंतरिक सुरक्षा तथा शांती-व्यवस्था बनाये रखने के लिए देश में आपातकाल लागू किया गया है परिणामस्वरूप जहां एक ओर असामाजिक तत्वों को बंदी बनाया गया.....।' वहीं दूसरी ओर जनता ने देखा कि राजनैतिक दलों के नेता उनके प्रतिनिधि, जनसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, स्वयंसेवक सर्वोदय जैसे सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता अपने-अपने घरों में नहीं हैं। उन्हें पुलिस द्वारा अर्द्धरात्रि के समय ही उनके घरों से उठा लिया गया और फिर तुरत-फुरत जेलों में ठूंस दिया गया। देश का जन-जन हैरान रह गया। सरकारी प्रचारतंत्र जनसेवियों को आर्थिक अपराधी, शांति व्यवस्था के दुश्मन और न जाने क्या-क्या कह रहा था और फिर आमजन ने जल्दी महसूस किया कि जैसे समूचा देश ही एक विशाल जेल खाने में परिणत हो गया है तथा लोक एक असमय कर्फ़्यू में जीने को विवश हैं। वातावरण इतना भयावह होता चला गया कि लोग सार्वजनिक स्थान पर बोलने से कतराने लगे और अपने घरों के भीतरी कोनो मे बोलने के स्थान पर फुसफुसा कर बतियाने लगे। प्रत्येक नागरिक के मन में यह भय समा गया कि उसे भी कभी भी गिफ्तार कर किसी भी जेल में ठूंस दिया जा सकता है।

                               वस्तुतः पूरा भारतवर्ष, वकील नहीं, दलील नहीं, अपील नहीं (NO VAKIL, NO DALEEL , NO APEEL ) के तंत्र से शासित हो रहा था।

                               किन्तु देश कब तक चुप बैठता? अन्याय और अन्यायी के सम्मुख आखिर कब तक सर झुकाये रहता। उसने भीतर ही भीतर जालिम के खिलाफ जंग का इरादा किया और फिर कश्मीर से कन्याकुमारी तथा गुजरात से गोवाहाटी तक कानाफूसी अभियान आरंभ हो गया। लोग गुपचुप चर्चा करने लगे- '' अरे, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब प्रधानमंत्री पद पर आसीन इंदिरा गांधी जी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया और जब लोकनायक जयप्रकाश बाबू के साथ जनता-जनार्दन उनसे इस्तीफा मांगने लगी तो श्रीमति गांधी ने उन सबको गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया जो उनके इस्तीफे के पीछे पड़े थे और इसके साथ ही आम जन की जुबान पर ताला जड़ दिया गया। किन्तु जनता सब जानती, सब समझती थी और उसने सत्ता लोभियों को सत्ता से बेदखल करने का निर्णय ले लिया था। यह बात अलग है कि सत्ता पर बिराजे जन, जनता की भंगिमा नहीं समझ रहे थे।

                              और आपातकाल के घोषणा के कुछ दिनों बाद ही भारत के महामहिम राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद साहब आपातकाल के अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहते थे। किन्तु इंदिरा जी के निकट सहयोगियों ने उन पर अनुचित जोर डाला, शायद कुछ बदसलूकी भी की और उस वजह से दिल का दौरा पड़ जाने के कारण राष्ट्रपति जी दिवंगत हो गए। यह बात अफवाह के रूप में शुरू हुई और सारे देश में प्रसारित हो गई, और फिर उसका खंडन करने के लिए आकाशवाणी निनादित हुई '' मरहूम राष्ट्रपति जी से इंदिरा जी के बड़े अच्छे संबंध थे। आपातकाल को लेकर उन पर कोई दबाव नहीं बनाया था.....।'' इत्यादि।

इस तरह रोज-ब-रोज अफवायें फैलने लगीं जनता ने अपना रेडियो सुनने के स्थान पर लुकछुप कर बी.बी.सी. सुनना शुरू कर दिया।

                               ऐसे चुनौतिपूर्ण समय में समाज के प्रबुद्ध जनसेवियों ने दो मोर्चे निर्मित किये। पहला मोर्चा उन परिवारों से कुशल क्षेम के लिए जिनके घर के लोग गिरफ्तार कर जेल भेजे गए थे और दूसरा मोर्चा आपातकाल की कालरात्रि से देश को निकाल कर दूसरी आजादी के सूर्योदय के लिए ऐसे नवयुवकों की आवश्यकता थी जो राष्ट्रभक्त तो हों ही संस्कारी और सेवा भावी भी हों तथा जो भूमिगत रहकर कार्य कर सकें और जब आवश्यकता हो तो सत्याग्रही के रूप में निरंकुश सत्ता के विरूद्ध आवाज बुलंद कर सकें। जल्दी ही देश के हर जिले और तहसील के लिए युवजन संगठित हुए। उनमें अपनी विनम्र सेवायें देने का सौभाग्य इन पंक्तियों के लेखक को भी प्राप्त हुआ। इन समितियों में यूं तो प्रत्येक राष्ट्रवादी सहज सम्मिलित था किन्तु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अधिक संख्या में थे। इन तरूणों ने अपने वरिष्ठों के मार्गदर्शन में अद्भूत कार्य किये।

                               जिन परिवारों के परिजन जेल में थे, उनके घर नियमित रूप से पहुंचना, उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु तन-मन-धन से सक्रिय रहना, ऐसे अधिकांश परिवारों के वर्ष भर के खाद्यान्न तथा गेहूं, चावल, दाल आदि की व्यवस्था करना, वृद्ध माता-पिता की सेवा करना, घर के कामों में जैसे नल या हैडपंप से दिन भर के लिए पानी का प्रबंध करना आदि सेवा कार्य इस युवा शक्ति की ओर थे।

                               और फिर जब सत्याग्रह की बारी आई तो उसमें युवजन अग्रणी हुए। इन सत्याग्रहियों को भीषण शारीरिक यातनायें दी गई और फिर कारागृह में भी डाला गया। किन्तु सत्याग्रहियों से देश में तानाशाही के विरूद्ध आवाज बुलंद हुई और देश एक नवीन चेतना एवं स्फूर्ति के साथ खड़ा हो गया। ऐसा लगा जैसे भारतीय जनमानस अपनी स्वाधीनता के लिए वहीं बलिदान देने को तत्पर है, जो सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू जैसे सहस्त्रों नौजवानों ने आजादी की लड़ाई में भारत माता के चरणों में भेंट किये थे। और फिर जब दुनिया के तमाम स्वाधीनता प्रिय राष्ट्रों ने तत्कालीन भारत सरकार पर नैतिक दबाब बनाया तो इंदिरा जी को विवष होकर संसदीय चुनावों की घोषणा करना पड़ी, उनमें वरिष्ठ, कनिष्ठ, सबने लोकतंत्र के योद्धा के रूप में जन-जन को जाग्रत कर आजाद जीने के अंतिम मौके को हस्तगत करने का शुभ संकल्प लिया और समूचे विश्व ने देखा कि भारत ने तानाशाही शक्तियों को जड़ समूल उखाड़ फेंका है। श्रीमति इंदिरा गांधी सहित निरंकुशता की सारी प्रतिमायें भूलुठित हुई और देश ने दूसरी आजादी का सूर्योदय उल्लास देखा। देश की स्वाधीनता प्रेमी जनता ने एक ऐसा इतिहास रचा डाला जिससे तानाशाही वृत्ति की हर शक्ति सबक लेगी।

                               प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चैहान ने आपातकाल के दौरान सामाजिक अथवा राजनैतिक कारणों से निरूद्ध मीसा बंधुओं को 20 जून 2008 से सम्मान निधि स्वीकृत कर सम्मानित किया है तथा 04 जून 2012 से इस सम्मान निधि में वृद्धि कर मीसाबंधुओं का गौरव बढ़ाया है। माननीय शिवराज जी के इस सराहनीय प्रयास का न केवल मध्यप्रदेश में सर्वत्र स्वागत हुआ है, बल्कि देश के अन्य राज्यों जैसे - छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश आदि ने भी अनुसरण किया है। आने वाले समय में राज्य विधान सभा और लोकसभा के चुनाव होने जा रहे है। लोकतंत्र को अक्षुण बनाये रखने तथा देश ? प्रदेश के विकास के लिए देश और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनाना आज की महती आवश्यकता है। मैं आशा करता हूँ कि लोकतंत्र संग्राम सेनानी इस महायज्ञ में अपनी पूरी क्षमता से योगदान करेंगे ।




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