आपातकाल इस देश के राजनैतिक इतिहास का एक बदनुमा दाग


प्रस्तुति- श्री कैलाश सोनी, अध्यक्ष लोकतन्त्र संरक्षक संघ म.प्र.

                      आपातकाल इस देश के राजनैतिक इतिहास पर एक बदनुमा दाग है जिसने सारी दुनिया में विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में उसकी लोकतान्त्रिक आत्मा को एक आदमी कैसे निगल सकता है यह कर दिखाया, युगों के इस देश की उन आत्माओ को उनके बलिदानो को जिनके बलबूते आज इस देश में सार्वभोम सत्ता सम्पन्न लोकतान्त्रिक गणराज्य इस्थापित हुआ, कैसे धूल धूसरित कर सकता है यह हुआ है हमने देखा है, सारे देश ने भोगा है । आगे देश के साथ ऐसा नहीं होगा, यह प्रश्न सबके सामने आज भी खड़ा है । जिसके हल के लिए आज भी पीढ़ी को सब कुछ साफ-साफ बताने एवं समझाने की आवश्यकता है ।
           25 जून 1975 की मध्यरात्रि इस देश की सबसे बडी काली अमावस्या है, जहां हमारी सारी लोकतांत्रिक मान्यताओं, सनातन के सारे संस्कारो को एक झटके में एक तानाशाही मनोवृत्ति की श्रीमती इंदिरा गांधी ने पद पर बनी रहने, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा उनका चुनाव रद्ध किये जाने के निर्णय के बावजूद देश पर आपातकाल थोपा । देश में एक व्यक्ति बना रहे, इसके लिये बिना कोई कारण के आपातकाल लगाया, देश की भीतरी बाहरी स्वतंत्रता को गंभीर खतरों का झूठा वितान खींचा गया। देश पर संकट बताकर आपातकाल लगा दिया।
                               इतना ही नहीं अपने अवैध चुनाव को वैध करने (रिस्टास्पेक्टिव) पुरानी तारीखों से असरकारक कानून बना कर चुनाव वैध कर काली ताकत देश की हुक्मरान बन गई । अपने पाप को ढ़ाकने तानाशाह क्या-क्या रूप रखता है कोई अपील नहीं, दलील नहीं, वकील नहीं । बोलने की स्वतंत्रता समाप्त, लोकतांत्रिक अधिकार समाप्त । अपने कुकृत्यों को ढांकने देश के सर्वोदयी संत विनोभा भावे के नाम पर इसे छद्म नाम ''अनुशासन पर्व'' से विभूषित किया गया। देश के सामने झूठा भ्रम फैलाया गया कि अब सब कुछ ठीक हो गया है, गाडि़याँ समय पर चलने लगी हैं, भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त हो गया है, देश पटरी पर आ गया है।
                               पूरे देश में सामाजिक यर्थात् परिवर्तन की इच्छा ने 1947 के बाद एक करवट लेकर जवानी ने अंगड़ाई ली। जवानी पहली बार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये, भ्रष्टाचार मुक्त, सम्पूर्ण भ्रांति की अभिलाषा से खड़ी हो गयी। जिसके हाथ में एक सिंबल था, झंडा था, लोकनायक जयप्रकाश नारायण का। इस देश की अस्मिता, राष्ट्रभक्ति जड़ता को तोड़कर लोकतांत्रिक मूल्यों के लिये खड़ी हो गई। सड़कों पर, जिसका नेतृत्व देश की मनीषा परिपक्व हाथों में था, सम्पूर्ण देश खड़ा हो गया। हर हिस्से में सम्पूर्ण क्रांति जिंदाबाद दूसरी आजादी की लड़ाई तानाशाही के खात्मे की लड़ाई हर प्रांत में लोकनायक के निर्देश पर जन संघर्ष समितियों छात्र युवा संघर्ष वाहिनियों के माध्यम से जंग शुरू। दिल्ली घेरने का शंखनाद पुरानी पीढ़ी के अवज्ञा आंदोलन को नई पीढ़ी ने पुनः जागृत किया। ऐसा जल सैलाब जयप्रकाश जी की रैलियों में वर्णन शब्दातीत है। हर जगह जयप्रकाश कहते-आदमी की जिंदाबाद बंद करो आदमी का क्या भरोसा मूल्यों की जिंदाबाद सम्पूर्ण क्रांति जिन्दाबाद, इसके लिये काम करो। दिल्ली कूच की घोषणा, देश का सारा लोकतांत्रिक जिगर देश की राष्ट्रभूक्ति जो कुछ देश के लिये मर मिटने की चाह रखने वाले तत्व थे सभी जेलों में। इसमें कोई संदेह नहीं।
                               सम्पूर्ण देश को ही जेल बना दिया गया। यहाँ तक कि कांग्रेस के भीतर के भी एक तबके को जो यह सवाल उठा रहा था कि आपको (स्व.इंदिरा गाँधी) तो सांसदों की बैठक में आने का अधिकार नहीं उन्हें भी जेल में बंद कर दिया गया। लगातार 19 माह 16 दिन न जाने कितने लोग असमय काल कवलित हुये, घर उजड़े, भीषण यातनाएँ लोगों ने सही, कारोबार समाप्त हो गये, लंबी गाथा। अंततोगत्वा एक बार फिर लोकतंत्र जीत गया दल नहीं झंडा नहीं, साधन नहीं, आधे जेल में लेकिन जब जनजागता है तब पहली बार प्रधानमंत्री के पद पर बैठा आदमी लोकतंत्र से पराभूत होता है। आपातकाल के पहले हुये संघर्ष जेल, बलिदान, जयप्रकाश के नेतृत्व ने और कुछ किया हो न किया हो पर 1947 में लोगों के लिये बलिदानों पर स्थापित एक खानदानबाद तानाशाही की जड़ता अवश्य तोड़ी, राजनैतिक इतिहास का पन्ना पलट गया।
                               लेकिन लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई हमें कहाँ तक जिंदा रख पाई, आज हमारा लोकतांत्रिक चैतन्य कहाँ तक हमें ला पाया। हम लोकतंत्र के संवाहक स्वयं बनने में हमारी पीढ़ी इसे आगे तक ले जाने में कहाँ तक सक्षम है और आज हमारे सामने कौन-कौन सी चुनौतियाँ फिर खड़ी हैं, इनके मुकाबले के लिये हम कहाँ तक समर्थ हैं। आगे की पीढ़ी को स्थायी लोकतांत्रिक मूल्यों को देने की जरूरत ज्यादा है। ग्लोबलाइजेशन के जमाने में पूरा विश्व एक बड़ी मंडी है। साम्राज्यवादी, व्यापारवादी ताकतें बाहुवली लोकतंत्र पर फिर हावी होना चाहती हैं। हम देख रहे हैं, आई.ए.एस. के हाथों हमारे सुरक्षा दस्तावेज को बिकते हुये।
                               आतंकवादी ताकतें और बड़े-बड़े जबड़ों को खोलकर सामने खड़ी है। लगता है हमारे सारे संस्कार, संवेदनायें, सद्गुण दांव पर हैं, सभी दिशाओं से हमारे ऊपर शारीरिक, सांस्कृतिक हमले जारी है। भोगवादी अभीष्टा ने देश में एक बड़ा हिस्सा अनकंसर्ड लोगों को बना दिया। कोई नृप होई हमें का हानि। लेकिन हमारा घर गाँव प्रदेश में, प्रदेश देश में। देश सुरक्षित होगा तक हम सुरक्षित होंगे। इस भाव की आवश्यकता है। केवल जड़ निमार्ण (इंफ्रास्ट्रक्चर) सड़क, बिजली, पानी यही और केवल यही अभीष्ठा नहीं है। इस स्प्रिट से न तो घर बनता है न देश।
                               आज जरूरत है लोकतंत्र कैसे स्थिर रहेगा। इसके स्थायी भावों को हम कैसे जिन्दा रखेंगे इसके लिये जड़ निर्माण के साथ दिल-दिमाग के निर्माण की आवश्यकता है। कुर्सी (पद) का स्वभाव है नींद आना हमें जगाते रहना पड़ेगा, जिससे जड़ता न आये लोकतंत्र के सारे अवयव जीवित रहे स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा का नाद है वो कभी बाधित न हो, उसे मत सराहो जिसने गलत तरीके से कमाया हो, यदि ऐसे लोगों को प्रतिष्ठित किया तो देश भी बिकेगा।
                               आज हम आपातकाल की 39 वीं वर्षी पर पहुँच गये हैं जिन लोगों ने लोकतंत्र के लिये जून 1975 से संघर्ष किया जेल गये, जेल के बाहर लड़ते रहे, उनमें से आधे लोग हमारे बीच नहीं हैं जो जवानी में जेल गये थे। वे प्रौढ़ावस्था पार कर चुके हैं। आज हम अपनी समस्याओं को लेकर यहाँ इकट्ठे नहीं हुये हैं न हमारा यह माँग सम्मेलन है। हम हृदय से साधुवाद करना चाहते हैं। मध्यप्रदेश के मान्यवर शिवराज सिंह सरकार को जिन्होंने आपातकाल में बर्बाद हुये लगभग 2900 बंधुओं, बहिनों, माताओं को जीने का आधार दिया। इसी का अनुसरण छत्तीसगढ़ सरकार ने किया बाद में बिहार सरकार ने, इस संबल से हम केवल जियेंगे नहीं अपने जीवन की बाकी बची ऊर्जा को लोकतंत्र एवं देश की वर्तमान चुनौतियाँ के लिये समर्पित होंगे। आज भी देश के सामने कम चुनौतियाँ नहीं हैं। 4 जून को बाबा रामदेव के राष्ट्रीय हित के शांतिपूर्ण आंदोलन के साथ भारत सरकार का बर्ताव आपातकाल को आज भी जीवित करता है। राजस्थान में मीसाबंदियों को प्रदान राहत निर्णय समाप्त कर दिया गया। आपातकाल के लिये कांग्रेस ने अभी तक देश से माफी नहीं माँगी है न उन्हें इसकी शर्मिंदगी है। इससे आने वाले दिन और चुनौतिपूर्ण है, यह सम्मेलन हमने यह भीख के लिये आयोजित नहीं किया है। हम जहाँ हैं, वहाँ हम क्या कर सकते हैं इसके चिंतन-मनन का यह अवसर है।




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