जेल डायरी


मीसाबंदियों के साथ गंभीर मारपीट

                       मध्यप्रदेश की लोक सेवा समिति के सभापति के पंजाब और कश्मीर का अध्ययन दौरा, जो कि 16 से 25 जून, 975 तक का निर्धारित था, पूरा करके मैं भोपाल वापस आया। मैंने बेल बाटम का पीला पेंट और धारीदार पूरी बांह का बुशर्ट तथा सिर पर ऊनी पीली कैप लगा रखी थी। मेरा विश्वास था कि इस वेश में न पुलिस अधिकारी पहचान सकेंगें न गुप्तचर विभाग के व्यक्ति। श्री अकबर भाई की मोटर साइकिल पर बैठकर ठीक 11 बजे विधानसभा भवन पहुँचते ही गेट पर मुझे गिरफ्तार किया जाकर जहाँगीराबाद थाने पर ले जाया गया, जहाँ पर अशोक नगर के विधायक श्री महेन्द्र सिंह भी गिरफ्तार कर लाये गये थे। मुझे इंदौर जेल ले जाया गया।
19 मार्च, 1976 धार जेल में मारपीट
                               आज बाहर के बैरक में हम कुल 11 कार्यकर्ता थे। 9 लोग पूर्व से ही बाहर के एक बैरक में रहते थे। उज्जैन से श्री याकूब खां तथा श्री मनोहर निगम इन दो लोगों को कल शाम को यहाँ लाया गया था। कल को प्रतिदिन के अनुसार वार्डन आकर इन दोनों बैरकों के ताले बंद कर गया किन्तु थोड़ी देर के बाद ही वह वापस आकर यह कह कर कि साहब ने कहा कि दोनों बैरकों के ताले खुले रहने दो-बैरकों के ताले खोलकर जाने लगा। हम लोगों ने उससे हमेशा के अनुसार ताले बंद करने का आग्रह भी किया किन्तु यह ताले खोलकर वापस चला गया। परिणामस्वरूप् दोनों बैरकों के ताले रातभर खुले ही रहे। जेल अधिकारियों के इस कार्य से हमें निश्चित तौर पर यह आशंका हो गई कि वे नियोजित रूप से कोई षड़यंत्र रच कर जेल का वातावरण खराब करने के लिये कोई बहाना तैयार करना चाहते हैं। हमारी यह आशंका आज सत्य हो गई। आज प्रातः काल 7 बजे श्री विक्रम वर्मा प्रतिदिन के अनुसार दैनिक भोजन सामग्री तथा अन्य वस्तुएँ प्राप्त करने के लिये इंचार्ज जेलर श्री गंगराड़े के धरमपुरी नहगर के निवासी हैं व एम.ए., एल.एल.बी. होकर धरमपुरी में वकालत करते हैं। साथ ही वे धार जिले के प्रमुख जनसंघ कार्यकर्ता होकर धरमपुरी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। श्री वर्मा ने एक दिन पूर्व ही जेलर से श्री बालकिशन नामक जेल के एक सिपाही के विरूद्ध नजरबंद कार्यकर्ताओ के साथ दुर्व्यवहार करने की लिखित शिकायत की थी। संयोग से उस समय उसी सिपाही की ड्यूटी गेट के बाहर लगी हुई थी। द्वेषवश उस सिपाही ने श्री वर्मा से झगड़ा किया एवं उनको बंदूक के कुन्दे से मारा। श्री वर्मा द्वारा बचाओं की आवाज लगाने पर बैरक के सामने टहल रहे दो अन्य नजरबंद कार्यकर्ता वहाँ पर गए। उन्हें भी उस सिपाही ने बंदूक क कुन्दे से मारा।
                       मैं उस समय अपने बैरक में व्यायाम कर रहा था। श्री वर्मा की आवाज सुनकर मैं बाहर आया तो देखा कि हमारे दो साथी श्री विक्रय वर्मा की सहारा देकर बैरक की तरफ ला रहे थे और श्री वर्मा के सिर पर खून बह रहा था। मैंने तत्काल अपने सब साथियों को अपने पास बुला लिया और सबको बैरक के अंदर चलने को कहा तथा श्री वर्मा से इस घटना की शिकायत लिखकर जेल अधीक्षक तथा पुलिस को भेजने को कहा।
                               इस बीच इंचार्ज जेलर श्री गंगराड़े लगभग 25-30 जेल वार्डरों सिपाहियों तथा जेल के सी.ओ. आदि को लेकर हमारे बैरक की तरफ आए। इन सभी लोगों के हाथों में बड़ी-बड़ी लाठियाँ थी तथा उन्हें आगे बढ़ने का इशारा करते हुए श्री गंगराड़े कह रहे थे कि मारों सालों को। जब मैंने उन्हें हमारे बैरक की ओर आते हुए देखा तथा कुछ दूर पर श्री गंगराड़े भी दिखाई दिए तो मैंने जोर से चिल्लाकर उन्हें सब लोगों को वापस लौटा देने तथा स्वयं को यहाँ आकर चर्चा करने का कहा। इसी समय जेल का अलार्म बनजे लगा। तब भी मैंने श्री गंगराड़े को अलार्म बंद कराने, जवानों को वापस बुलाने तथा स्वयं यहाँ आकर चर्चा करने का अनुरोध किया। उनके न मानने तथा अलार्म बजते रहने के कारण में भी बैरक के अंदर आ गया और उसी समय ड्यूटी पर तैनात वार्डन ने बैरक का ताला भी बंद कर दिया। हमारे आ जाने तथा बैरक का ताला बंद हो जाने से हम निश्चित होकर बैरक के बरामदे में बैठ गए तथा श्री वर्मा को साथ लेकर घटना की शिकायत लिखने बैठ गए।
                               इसके कुछ क्षण बाद ही जेल के सिपाही तथा सी.ओ. आदि आगे बढ़कर हमारे बैरकों के सामने आ गए और अनेक अश्लील गालियाँ देने लगे। हम सब चूँकि अंदर बैरक में बंद थे इसलिए हम कुछ नहीं बोले। इसी समय श्री गंगराड़े बैरकों के सामने आए और उनके कहने पर वार्डन ने दोनों बैरक के ताले खोल दिए। श्री गंगराड़े तथा उनके पीछे-पीछे लाठियाँ लिए हुए जेल के लोगों को अंदर आते देखकर हम लोग बरामदे से उठकर अंदर के कमरें में चले गए तथा कमरे के दोनों दरवाजनों को अंदर से बंदर करके पीछे से कुर्सी टेबल आदि लगाकर उन्हें पकड़कर खड़े हो गए। हमने अंदर से सुना कि श्री गंगराड़े ने सिपाहियों को दरवाजे तोड़ कर अंदर घुसने का आदेश दिया। तब भी हमने अंदर से श्री गंगराड़े को अकारण मारपीट न करने का अनुरोध किया जिसे उसने अनसुना कर दिया। उनके आदेश पर सिपाहियों ने फरशी के टुकड़ों तथा लाठियों से दरवाजों को तोड़ना शुरू कर दिया, यह देख हम अपनी अंदर दवाब अपर्याप्त जानकार दरवाजों को छोड़कर अलग हट गए। दरवाजा खुलते ही श्री गंगराड़े के साथ दोनों ओर के दरवाजों से कई सिपाही अंदर घुस आए तथा निर्ममता के साथ लाठियों से हमारी पिटाई करने लगे। मैं दोनों हाथ पीछे की ओर सिर पर रखकर खड़ा हो गया। इसी बीच मुझे दो लाठियाँ पड़ी। जो मेरी पीठ पर लगी तथा उनके दाहिने हाथ की उंगलियों में भी चोंट आई। इसके तत्काल बाद और लोग भी उसी कोने में आ गए। मार से बचने लिए हम सब लोग नीचे बैठ गए। मुझ पर मार पड़ते देखकर श्री चन्द्र भान गावा खंडवा, श्री जेठमल पालीवाल भौंरासा तथा श्री सरदार सिंह बदनावर ने मुझे तीनों और से ढंक लिया, जिससे मैं बचा रहा और सारी चोंटे इन तीनों लोगों ने झेल ली। फलस्वरूप तीनों गंभीरता से आहत हुए लगभग आधे घंटे तक मारपीट चलती रही तथा बाहर से पुलिस दल आने पर उन पर मारपीट बंद कराई तब सब जेल वाले वहाँ से चले गए।
                         इनके जाने के बाद मैंने देखा कि मेरे सभी साथी आहत होकर पड़े थे। कोई रो रहा था, कोई चीख रहा था और कोई बेहोश जैसा पड़ा था। कई मित्रों के कपड़े खून से भीगे थे। मैंने उठकर उन्हें पानी पिलाया तथा चाय जो बनी चूल्हे पर ही रखी उसे गरम करके उन्हें पिलाया।
                               इसके पश्चात् लगभग 9 बजे जिले के अधिकारी जेल आए। उनमें जिलाध्यक्ष, जिला पुलिस अधीक्षक तथा अधीक्षक और उनके अधीनस्थ कर्मचारी थे। ये अधिकारी हमसे मिले, हमने सारी घटना उन्हें सुनाई कार्यवाही करने के लिए लिखकर भी घटना की शिकायत सौंप दी।
                               मैंने उसी समय एक अर्जेंट तार का प्रारूप् बनाकर अधीक्षक के द्वारा मेरे निजी व्यय से भेजने को दिया। ये राज्यपाल, मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री, म.प्र. अध्यक्ष विधानसभा, मुख्य सचिव तथा गृह सचिव को देने के लिए दिए।
                               जिला अधिकारियों से चर्चा हुई। कलेक्टर ने कहा कि सारी घटना की मेजिस्ट्रियल इन्क्वायरी के आदेश देता हूँ। जाँच अधिकारी की नियुक्ति करवाते हुए आज ही आरंभ करा दूँगा। उन्होंने डाक्टरों को भी बुला लिया सबकी मरहम पट्टी शीघ्र करने को कहा।
                               इस बीच उप पुलिस अधीक्षक श्री विजय सिंह ने आकर मुझसे कहा कि अंदर के कार्यकर्ता आपकों याद कर रहे है और जब में उनके साथ जेल के अंदर बैरक में गया तो जानकारी मिली की वहाँ भी कार्यकर्ताओं के दो बैरक में मारपीट की है। इससे पूर्व मेरा अनुमान यही था कि बाहर के बैरक में मारपीट हुई होगी।
                               जब उस बैरक के अंदर जाकर देखा तो वहाँ कार्यकर्ताओं की दशा हमारे बैरक से भी अधिक भयावह थी। पिटे हुए कार्यकर्ता दर्द की पीड़ा से चीख और कराह रहे थे। कुछ बेहोश से पड़े थे तथा कुछ लोग बता रहे थे कि उनके अंग हिलाए डुलाए नहीं जा रहे हैं। इससे लगता है कि हड्डियाँ टूट गई हैं। मैंने सब को आश्वस्त किया।
                               इसी प्रकार भला चंगा देखकर उनकों भी समाधान हुआ। किन्तु घायल मित्रों की दशा तथा उनके खून भरे कपड़े तथा रक्त से सना फर्श देखकर मुझे मर्मान्तक पीड़ा हुई इसके बाद मैंने साथी मित्रों की जानकारी ली तो पता लगा कि 42 कार्यकर्ताओं में 31 लोगों को चोंटें आई हैं और उनमे से 25 लोगों को 1 से 10 तक टांके आए हैं। यह भी जानकारी मिली कि पुलिस ने खून से सने कपड़े पंचनामा करके अपने कब्जे में लिए हैं।
                               इसके पश्चात् लगभग 6 बजे डिप्टी कलेक्टर श्री नागर मेरे पास आए। उन्हें कलेक्टर ने मेजिस्ट्रियल जाँच के लिए नियुक्त किया है। मैंने उन्हें अपना बयान दिया।

(श्री कैलाश जोशी की जेल डायरी से आभार)




Facebook Like

Social Link

   


   

Contact us

36, पंधाना रोड खण्डवा ( म. प्र.) 450001
मोबाइल - +919407100434 ,+919407100635
फोन / फेक्स - +91-07332226614
Email- misabandi@gmail.com

Copyright SewapathSansthan 2015-16.