शाह कमीशन

आपातकालीन ज्यादतियों का जाँच कमीशन
सुरेश अग्रवाल - प्रदेश संपादक म. प्र.


आपातकाल के दौरान जो ज्यादतियाँ हुई थीं सत्ता परिवर्तन के बाद उनकी जाँच के लिये जाँच कमीशन बैठा और मध्यप्रदेश में श्री ए.डी.देवरस की अध्यक्षता में जाँच आयोग ने सुनवाई की। नरसिंहपुर जिले के एक शिक्षक श्री मनमोहन प्रसाद नारौलिया ने उन्हें मीसा में निरूद्ध किये जाने की शिकायत की थी जिसकी जाँच हुई। आयोग में सुनवाई हुई। इस प्रकरण में आयोग के निर्णय की रिपोर्ट प्रस्तुत है

( अध्यक्षता - श्री ए. डी. देवरस )
रिपोर्ट 1824 शाह आयोग नं 4/एम. पी. 371/10185/ए ए शिकायत नं 44/78
शिकायतकर्ता- श्री मनमोहन प्रसाद नारौलिया
शासकीय शाला सर्रा तहः गोटेगांव जिला नरसिंगपुर

श्री मनमोहन प्रसाद नारौलिया शासकीय स्कूल सर्रा ने मीसा में अवरूद्ध करने बाबत् शिकायत की थी।

1. स्टेशन आफीसर गोटेगाँव श्री एम.पी.दुबे ने शिकायत एस.पी. को 19 अक्टूबर 1976 को सिफारिश की थी कि श्री नारौलिया को मीसा में निरूद्ध किया जावे। एस.पी. श्री दास ने उक्त रिपोर्ट पर तत्काल कार्यवाही कर और स्पेशल ब्राँच रिकार्ड उसी दिन मीसा से निरूद्ध किया गया। जिला मजिस्ट्रेट श्री पटवर्धन ने अविलंब 19 अक्टूबर 1976 को श्री नारौलिया को मीसा से निरूद्ध करने का आदेश जारी किया। उन्होंने गृह सचिव को निरूद्ध करने का आदेश जारी किया। उन्होंने गृह सचिव को निरूद्ध करने के आधार सहित ज्ञापन भेजा। निरूद्ध करने का आधार श्री नारौलिया द्वारा शासकीय नीतियों विशेषकर परिवार नियोजन नीति का विरोध किया था। उन्होंने तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के विरूद्ध अशोभनीय भाषा का प्रयोग किया था। तात्कालीन गृह सचिव श्री पी.के. दुबे ने 29 अक्टूबर 1976 को शंका जाहिर की थी और जाँच हेतु लिखा गया।

                               मेरे ख्याल से इस केस में पूरी जाँच करने के बाद आदेश पारित करना उचित होगा। यदि वास्तव में श्री नारौलिया ने फेमिली प्लानिंग का विरोध नहीं किया है, तो मीसा के अंतर्गत उनका निरोध ज्यादती होगी व मीसा का दुरूपयोग भी।

2. उन्होंने इस प्रकरण को मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल के पास भेजा और साथमें आरोपों की जाँच के आदेश भी दिये। सि. सर्जन नरसिंहपुर ने तत्काल जाँच कर 2 नवंबर, 1976 को पूर्ण की। उसी दिन गृह सचिव ने निरूद्ध करने की पुष्टि कर दी। मुख्यमंत्री ने भी दिनांक 17 नवंबर, 1976 के आदेश के अनुसार निरोध कायम रखने का आदेश पारित कर दिया। इस प्रकार श्री नारौलिया 19 अक्टूबर, 1976 से 21 मार्च, 1977 तक निरूद्ध रहे, जब यह आदेश वापिस लिया गया।

3. श्री नारौलिया ने बतलाया कि वे शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के वर्ग 3 के होशंगाबाद संभाग के संभागीय सचिव थे। उन्होंने बतलाया कि उन्होंने और उनके साथी शिक्षकों ने परिवार नियोजन कार्यक्रम में 16 सितम्बर, 1976 और 20 सितम्बर को सक्रिय भाग लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला पंचायत एवं वेलफेयर आफीसर श्री सिंधी, एस.डी.ओ. श्री ठाकुर, तहसीलदार श्री धवन और एक फारेस्ट रेंजर ने सहमति पत्र छीन लिये। उन्होंने इस प्रोत्साहन पत्रों को नष्ट कर दिया और स्वयं को प्रोत्साहनकर्ता बनाया जिससे प्रोत्साहन शुक्ल उन्हें प्राप्त हो सके।

शिकायतकर्ताओं ने इस भ्रष्टाचार का विरोध किया। एस.डी.ओ. ठाकुर पंचायत एवं वेलफेयर आफीसर श्री सिंधी को 19 सितम्बर को कैम्प से हटा दिया। शिकायतकर्ताओं ने इस गलत कार्यवाही और ज्यादती के विरूद्ध मुख्यमंत्री एवं अन्य उच्च अधिकारियों की शिकायत की। इस शिकायत के विरोध स्वरूप् इन जिला प्रशासन ने श्री मुशरान ओर सुरेशचंद्र की सलाह पर मीसा में अवरूद्ध करने का आदेश पारित कर दिया। श्री नारौलिया ने इंकार किया कि उन्होंने परिवार नियोजन एवं शासकीय नीतियों का विरोध किया था।

4. पी. 24 विभागीय प्रोत्साहन प्रकरणों का विभाजन विभागवार है। डॉ कायरिया जो इसके प्रभार में थे उन्होंने बतलाया कि शिक्षा विभाग ने काफी संख्या में प्रोत्साहन का कार्य किया है। इसलिये कोई शंका की बात नहीं है। शिक्षकों ने अच्छा कार्य कर योजना को सफल बनाया है। एस.डी.ओ. ठाकुर जो कैम्प के इंचार्ज थे तहसीलदार श्री रावत और जिला पंचायत अधिकारी श्री सिंधी ने नारौलिया को इस कैम्पों में उपस्थित पाया। इन तीनों अधिकारियों ने श्री नारौलिया को योजना का विरोध करते नहीं पाया ऐसा उनका कथन है। श्री नारौलिया जी, श्री वास्तव, पी.डब्ल्यू.आइ्र. श्री बलीराम कुशवाहा शिक्षक और अन्य अभियोजन के गवाहों ने एकमत कहा कि नारौलिया ने परिवार नियोजन कार्यक्रम में सहयोग किया था। गटई साब (गोटेगाँव) ने कहा कि शिक्षक ने प्रोत्साहन किया था परंतु तहसीलदार ने जबरन उन्हें आपरेशन के लिये ले गये। आपरेशन रिकार्ड में दिखाया गया कि तहसीलदार ने प्रोत्साहित किया। शिक्षकों ने एतराज किया कि इस तरह से उनके आपरेशन केश दूसरों के नाम पर लिखे गए। नारौलिया ने जिला स्वास्थ्य अधिकारी से इसकी शिकायत 18 सितम्बर, 1976 को की थी। यह शिकायत शिक्षकों एवं प्राचार्य आर.एम.श्रीवास्तव से की गई शिकायत से मेल खाती है एवं अन्य शिक्षकों को कैम्प में उपस्थित रहने को कहा, जिससे सर्रा से भेजे जाने वाले प्रकरण देखें।

5. श्री नारौलिया और एस.के.श्रीवास्तव 19 सितम्बर को कैम्प में रहे। नारौलिया ने शिक्षकों द्वारा भेजे गये लोगों की सूची बनाई थी। करीब 1 बजे अधिकारी वर्ग एक प्रीतम सिंह को जीप से आपरेशन के लिए लाए। उन्होंने कहा जिला पंचायत अधिकारी सिंधी जबरन उसे जीप से खींचकर आपरेशन के लिये लाए। प्रीतम सिंह ने भी भी इस तरह का बयान दिया। श्री नारौलिया ने सिंधी की इस तरह की हरकत का विरोध किया और उनके कहने पर उसे छोड़ दिया गया। उन्होंने और श्रीवास्तव ने कहा कि सिंधी इस पर शिक्षकों से नाराज हो गये। उन्होंने और श्रीवास्तव ने कहा कि सिंधी इस पर शिक्षकों से नाराज हो गये उन्होंने एस.डी.ओ. को उकसाया कि शिक्षकों को यहाँ से निकाला जावे। एस.डी.ओ. ने शिक्षकों को यहाँ से चले जाने का आदेश दिया और उनकी टेबिल और अन्य सामान फेंक दिया। इसके विपरीत श्री सिंधी और ठाकुर ने कहा कि शिक्षकों के विरूद्ध शिकायतें थीं, इसलिए उनका सामान खास जगह से हटा दिया गया था। उन्होंने इंकार किया कि शिक्षकों को वहाँ से जाने को कहा अथवा टेबिल इत्यादि फेंकी थी। इसे उन्होंने मामूली हादसा बनवाया। ठाकुर के अनुसार शिक्षकगण कैम्प में उपस्थित रहे इसके पश्चात् ऐसी कोई घटना 19 सितम्बर के बाद नहीं हुई।

6. श्री नारौलिया और अन्य शिक्षकों को वहाँ से हटाए जाने के बाद शिक्षकों ने बैठक कर अपने सचिव नारौलिया को एस.डी.ओ. और अन्य के विरूद्ध विरोध किया। श्री नारौलिया ने मुख्यमंत्री, कमिश्नर, कलेक्टर और अन्य अधिकारियों से शिकायत की। इस शिकायत का उसी तारीख से मेल खाता है। एस.पी. के गोपनीय प्रतिवेदन से यह पाया गया कि सर्रा के शिक्षकों को कैम्प क्षेत्र में शिक्षकों के जाने की रोक लगी थी और यह स्पष्ट था कि शिक्षकों और एस.डी.ओ., डी.पी.इ.ओ. सिंधी और आपके बीच विवाद था। एस.डी.ओ. ठाकुर ने शिक्षकों एवं फर्नीचर आदि को हटा दिया था।

विरोध किया। हेड कान्सटेबिल रामलखन तिवारी स्पेशल ब्रांच ने अपने लिखित बयान में कहा कि नारौलिया ने कभी परिवार नियोजन योजना का विरोध नहीं किया। उन्होंने सिर्फ शिक्षकों की शिकायतों के बारे में कहा था। शाला के प्राचार्य आर.एन. श्रीवास्तव, लखीराम कुशवाहा, सलमान कुरैशी, एस.के.श्रीवास्तव और अन्य शिक्षकों ने दिनेश पालीवाल (यूथ कांग्रेस) से शपथ लेकर कहा था कि नारौलिया ने प्रभावी ढंग से गोटेगाँव परिवार नियोजन कार्यक्रम में भाग लिया था। 19 सितम्बर के प्रकरण के पश्चात् गवाहानों ने बताया इसके पश्चात् कोई घटना विशेष रूप से 4 सितम्बर, 1976 को नहीं हुई। किसी ने भी यह नहीं कहा कि श्री नारौलिया ने 4 सितम्बर को आम रूप से परिवार नियोजन कार्यक्रम का विरोध किया फिर भी एस.पी. ने अपने गोपनीय प्रतिवेदन में यह लिखा कि कांग्रेस के नेता उच्च अधिकारियों को शिकायत करने वाले हैं कि नारौलिया ने परिवार नियोजन का विरोध किया और झूठी अफवाह फैलाई कि सर्रा गाँव का एक व्यक्ति त्रृटिपूर्ण आपरेशन के कारण मारा गया है। यह भी जाहिर नहीं है कि कांग्रेस के नेताओं ने ऐसी कोई शिकायत की है। इस असत्य अफवाह के कारण जिला प्रशासन ने नारौलिया को मीसा में निरूद्ध करने के आदेश दिये। मैं यह कह सकता हूँ कि उपरोक्त आरोप के लिये कोई साक्ष्य सत्यता सिद्ध करने के लिये उपलब्ध नहीं है।

8. आगे नारौलिया के पक्ष में अच्छी साक्ष्य उपलब्ध है कि वे परिवार नियोजन पक्षधर है। उन्होंने 1972 में अपनी पत्नी का टी.टी. आपरेशन कराया था जबकि उनके 4 कन्यायें थीं और पुत्र नहीं था। 8 अक्टूबर, 1976 को उन्होंने कुरैशी को आपरेशन के लिये प्रेरित किया था, उसका प्रमाण पत्र संलग्न है। अतः यह कहना कि नारौलिया ने परिवार नियोजन का विरोध किया था, असंभव है।

9. नारौलिया के विरूद्ध यही मुख्य आरोप था कि जिसके कारण उन्हें मीसा में अवरूद्ध किया गया था। जिला मजिस्ट्रेट ने अवरूद्ध करने के कारणों से शासन को अवगत कराया था। जिसमें उन्होंने लिखा कि नारौलिया स्थानीय राजनीति में दखल के उच्च अधिकारियों के खिलाफ झूठी शिकायतें करते थे इसलिये उन्हें होशंगाबाद डिवीजन से स्थानांतर किया गया था, जो उन्होंने किसी प्रकार रद्ध करा लिया। इस कारण जब वे शासन की नीतियों का विरोध करने लगे। कलेक्टर श्री पटवर्धन ने अपने साक्ष्य में कहा कि उपरोक्त आरोप बेबुनियाद है और उन पर कोई आरोप नहीं बनता। पूर्व आरोप कि उन्होंने परिवार नियोजना का विरोध किया और प्रधानमंत्री के विरूद्ध अप शब्दों का प्रयोग किया, यह रिपोर्ट पुलिस की गोपनीय जानकारों के अनुसार थी। मैं पहले ही कह चुका हूँ कि उपरोक्त आरोप सत्यता से परे है। पटवर्धन ने साक्ष्य के दौरान कहा कि यदि मामला उनके पास जाता तो उपरोक्त आधार पर उन्हें बंद नहीं करते बल्कि उन्हें लंबी छूट देकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जाती।

10. उस समय जो परिस्थितियाँ थीं जिला मजिस्ट्रेट श्री परवर्धन पर दबाव था कि वे नारौलिया को बंद करें। कमिश्नर श्री बजाज की गवाही पर प्रकाश डालती है कि 13 अक्टूबर, 1976 को वित्तमंत्री श्री मुशरान गाडरवारा अस्पताल के उद्घाटन के लिए गए थे और वहाँ पर उन्होंने नारौलिया के विरूद्ध मीसा में कार्यवाही करने को कहा। जिसका अर्थ मैंने मीसा के असंगत कार्यवाही समझकर कलेक्टर एवं एस.डी.ओ. को सूचना दी। उन्होंने कहा कि जिला अधिकारियों ने भी मुझे नारौलिया की गतिविधियों की जानकारी दी और उनके विचार विमर्श के पश्चात् 13 अक्टूबर, 1976 को निर्णय हुआ कि नारौलिया को मीसा में कार्यवाही की जावे। कलेक्टर परवर्धन, एस.पी.दास ने भी इसी प्रकार मंशा जाहिर की। श्री मुशरान तात्कालीन वित्तमंत्री ने कहा कि उनकी कमिश्नर से ऐसी कोई बात नहीं हुई है और इस प्रकरण की कार्यवाही के कोई निर्देश नहीं दिये थे। श्री मुशरान ने कहा कि 13 अक्टूबर, 1976 को कुछ लोगों ने नारौलिया के खिलाफ शिकायत की थी और उन्होंने अधिकारियों से इस आरोप को देखने को कहा था। मुशरान का यह बयान विश्वास करने योग्य नहीं है। 20 अक्टूबर 1976 को श्री बाजपेयी ने एक अर्द्धशासकीय पत्र गृह सचिव को भेजा इसमें मुशरान ने व्यक्तिगत रूप् से उनसे नारौलिया को शासन विरोधी नीतियों के बारे में कहा था। यद्यपि श्री मुशरान ने इस प्रकरण के आरोप से इंकार किया परंतु श्री बाजपेयी को इस प्रकार झूठ लिखने का कोई कारण नहीं था जो कि उन्होंने 20 अक्टूबर 1976 को लिखा था।

11. श्री मुशरान ने यह कहने की कोशिश की कि मैं नारौलिया को नहीं जानता। उन्होंने इंकार किया कि वे नारौलिया के विरूद्ध थे और उन्होंने उनका स्थानांतरण होशंगाबाद डिवीजन से कराया था। उन्होंने इंकार किया कि सेलट डी.ई.ओ. को नारौलिया के ट्रांसफर के आर्डर को स्थगित कने को कहा था। हालांकि सेलट ने इस प्रकार कहा था। तदनुसार उन्होंने शिक्षा मंत्री के प्रायवेट सेक्रेटरी से निर्देश 25 नवंबर के पत्र के अनुसार निर्देश लेने लिखा था। यद्यपि मुशरान ने इस पत्र की सत्यता से नकारा, परंतु मैं उस पर विश्वास करता हूँ। मैं सेलट की साक्ष्य पर विश्वास करता हूँ कि मुशरान ने उनसे नारौलिया के केंसेलेशन आर्डर को जारी नहीं करें। यह सिद्ध करता है कि श्री मुशरान नारौलिया को जानते थे और नारौलिया को नरसिंहपुर जिले से स्थानांतर करने में रूचि रखते थे।

12. वित्तमंत्री के कथन का विरोधाभास गृह सचिव के नोट से स्पष्ट होता है कि मैंने इस नोट शीट को देखा है। श्री दुबे का यह अनुमान था कि नारौलिया का निरूद्ध करना अनुचित थां कलेक्टर ने वित्तमंत्री जी से भी इस केस का जिक्र किया था और वित्तमंत्री जी ने मुझे यह कहा कि श्री नारौलिया का निरोध आवश्यक है, अन्यथा जिला प्रशासन का मनोबल नीचा होगा।

कलेक्टर श्री पटवर्धन ने अपने बयान में कहा कि मैंने वित्तमंत्री से नारौलिया के विरूद्ध निरूद्ध करने की कार्यवाही की जावे। इस नोट के विरूद्ध वित्तमंत्री ने कहा उन्हें याद नहीं है कि मैंने इस विषय पर गृह सचिव से कोई बात की है। मुझे संदेह की गुनजाइश नहीं है कि श्री दुबे नोट शीट 29 अक्टूबर, 1976 को लिखी थी। ऐसा प्रतीत होता है कि श्री मुशरान ने यह सचिव पर दबाव डाला कि नारौलिया के निरूद्ध के आदेश की पुष्टि की जावे। अतः यह असंभव प्रतीत होता है कि मुशरान का यह कथन कि वे नारौलिया का नहीं जानते विश्वनीय नहीं। उन्होंने उन्हें निरूद्ध में कोई रूचि नहीं। मैं यह मानता हूँ कि मुशरान ने कमिश्नर को नारौलिया को मीसा के अंतर्गत कार्यवाही करने के निर्देश दिया जिला दण्डाधिकारी श्री पटवर्धन और एस.पी. श्री दास ने श्री मुशरान द्वारा दिए गए। उनका निरूद्ध अन्यायपूर्ण था। नारौलिया को झूठे आरोपों के तहत् निरूद्ध किया गया। वित्तमंत्री मुशरान ने गृह सचिव को भी निरूद्ध की कार्यवाही की पुष्टि करने का दबाब डाला। श्री मुशरान अनाधिकृत और गलत करतूत में निरूद्ध करने के दोषी है।
                               कमिश्नर श्री बाजपेयी, कलेक्टर पटवर्धन और एस.पी. श्री दास काफी कमजोर रहे जो मुशरान के दबाव में रहे और इस सीमा तक ये लोग भी दोषी है।

13. जैसा पहले कह चुके है कि नारौलिया ने परिवार नियोजन का विरोध किया था यह झूठ है यदि सत्य भी हो तो यह मीसा में बंद करने का उचित आधार नहीं हो सकता। तात्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल का दिनांक 17 नवम्बर, 1976 का आदेश कि फिलहाल निरोध कायम रहे अधिकारों का दुरूपयोग है।

14. अंत में सुझाव एक मामूली घटना मुझ कुछ लिखने को बाध्य कर रही है। अधिक तथ्यों के आधार पर गृह सचिव श्री दुबे ने शंका जताई थी कि निरूद्ध करने के कारण शंकाप्रद हैं इसलिये उन्होंने मामले को सी.एम. को भेजने के पूर्व विस्तृत जाँच की सिफारिश की। तत्काल की संचालक स्वास्थ्य विभाग को आदेश दिया गया था कि वे दूसरी जाँच कर रिपोर्ट दें। संचालन ने जिला के सिविल सर्जन को जाँच के आदेश दिए। सिविल सर्जन ने बिना देर लगाये रेड कोड तत्काल रिपोर्ट दे दी कि नारौलिया पर जिला दण्डाधिकारी द्वारा लगाए आरोप सही हैं। सिविल सर्जन ने 8 गवाराहें के तथा 2 डाॅक्टर्स के बयानों के आधार पर रिपोर्ट भेजी। जो डाॅक्टर्स आॅपरेशन थियेटर के बाहर घटना से बाकिफ नहीं थे इस बात के लिये इस बात के लिये उत्सुक थे कि जिला अधिकारी के कृपा पात्र बने रहने के लिये यह गवाही दें कि नारौलिया पर लगाए गए आरोप सही है। डाॅ.कोपरिया ने बाद में अपने बयान में कहा कि मुझे इस प्रकारण की कोई व्यक्तिगत जानकारी है। इस तरह की जानकारी मुझे स्टाॅफ के मेम्बर से मिली थी। मैंने पहले ही मान लिया है कि नारौलिया के विरूद्ध परिवार नियोजन कार्यक्रम का आरोप झूठ है। प्रश्न यह है कि डाॅक्टर्स ने कैसे झूठ गवाही दी और इस प्रकार की रिपोर्ट की।
                               यह किसी प्रकार विवाद का विषय नहीं है कि डाॅक्टर्स और अन्य जिला अधिकारियों जिला मजिस्ट्रेट के विरोध का साहस कर सकें। आज के प्रशासनिक ताने बाने में जिला मजिस्ट्रेट के मातहत सभी जिला अधिकारी होते है और वे जिला मजिस्ट्रेट का प्रतिवाद नहीं कर सकते (जजों को छोड़कर) क्योंकि कलेक्टर इस सभी की गोपनीय चरित्रवाली लिखता है।
                               एक अचेत या कमजोर कलेक्टर जिले के लिए नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि कोई भी अधिकारी अपने भविष्य को दांव पर लगाकर उसका विरोध नहीं कर सकता। समाज को ऐसे एस.पी., सिविल सर्जन या एक्जी.इंजीनियर की आवश्यकता है जो कलेक्टर से कह सके कि उनके अनुचित या अवैधानिक आदेशों का पालन नहीं करेंगे। क्या अधिकारों का विकेन्द्रीकरण आवश्यक नहीं? विभागीय अधिकारी अपने मातहतों पर उचित ढंग से निगरानी रख सकेंगे। मैं यह समझता हूँ कि अब समय आ गया है कि विभिन्न विभागीय अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली लिखने का कलेक्टर के अधिकार को समाप्त किया जावे। जिससे जिले में स्वस्थ रूप् से प्रशासनिक कार्य किए जा सकें। कलेक्टर सिर्फ समन्वय के मामलों में ही दखल दें। इस प्रकार वित मंत्री या उसके सहयोगी कमिश्नर या कलेक्टर के कानों में चुगली करना अप्रभावी रहेगा। यह समाज की माँग हैं मैं उम्मीद करता हूँ कि शासन इस पक्ष को समझे जिससे प्रशासन को नई दिशा मिले।

अनुवादक
रामनाथ गुप्ता




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