1977 लोकसभा चुनाव



देश के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के नेता, विभिन्न सामाजिक संगठनो के पदाधिकारी, जन सामान्य में प्रभाव रखने वाले सामाजिक करकर्ताओं को 26 जनू, 1975 से जेलों में डाल दिया गया था तथा पूरे देश में विरोध के स्वरों को कुचलने के लिये भय एवं आतंक का साम्राज्य स्थापित किया गया था। कहीं से भी विरोध की आवाज उठने पर उसे दबाने हेतु अमानवीय तरीकों का उपयोग कर विरोध को कुचलने हेतु इंदिरा गाँधी की तानाशाह सरकार कटीबद्ध थी। ऐसे समय विरोध की आग भीतर ही भीतर सुलग रही थी। तानाशाह के कानों में एक ही आवाज पहुँच रही थी कि सारे विरोधियों को कुचल दिया गया है। शासकीय एजेंसियाँ एवं खुफिया विभाग एक ही स्वर में 'इंदिरा इज इंडिया' का राग अलाप रहे थे। श्रीमती इंदिरा गाँधी विरोधियों का दमन कर अपने को विजेता मुद्रा में अनुभव कर रही थी। आपातकाल के दौरान ही लोकसभा का कार्यकाल 2 वर्ष के लिये बढ़ा दिया गया था। देश में कहीं भी चुनाव की संभावना नजर नहीं आ रही थी। लाखों कार्यकर्ता एवं नेता जेलों में बंद थे। देश की राजनीति के वातावरण में तुफान के पूर्व की शांति छायी हुई थी।
                               18 जनवरी, 1977 को श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा अचानक लोकसभा चुनाव की घोषणा की गई तथा आपातकाल में ढिलाई देने एवं राजनैतिक बंदियों को धीरे-धीरे छोड़े जाने की घोषणा की गई। जनमानस आश्चर्यचकित था। जनता को विश्वास नहीं था कि इस देश में किसी प्रकार से पुनः लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा। क्योंकि जनमानस ने जेलों में तथा पुलिस थानों में होने वाले अत्याचार, जनता की खुली लूट, अफसरों की मनमानी, भ्रष्टाचारी, चापलुसों का प्रशासन में दबदबा देखा था। विश्वास नहीं था कि विरोधी नेताओं पर जूल्म करने वाली सरकार उन्हें जेलों से जिंदा बाहर आने भी देगी। सरकार की विश्वसनीयता जनमानस में समाप्त हो चुकी थी। अंतराष्ट्रीय दवाब एवं अपने विजेता होने की कल्पना में श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा 1977 का लोकसभा चुनाव आपातकाल के दौरान सम्पन्न कराया गया। चुनाव की घोषणा 18 जनवरी, 1977 को सरकार द्वारा तथा चुनाव आयोग द्वारा कार्यक्रम बनाकर 21 मार्च, 1977 के पूर्व चुनाव कराकर परिणामों की घोषणा सहित सम्पूर्ण कार्यक्रम बनाया गया।
                               चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रमुख नेताओं को धीरे-धीरे जेल से रिहा किया गया। किन्तु अनेक छोटे कार्यकर्ता एवं समाजसेवी इस दौरान भी जेल से रिहा नहीं किये गये। श्रीमती इंदिरा गाँधी देश को बंधक बनाकर चुनाव में विजय प्राप्त करना चाहती थी। किन्तु जनमानस में फैला आक्रोश धीरे-धीरे खुली हवा में आने लगा। औपचारिक रूप से जनता पार्टी नाम से विरोधी दल का गठन किया गया, जिसका चुनाव चिन्ह भारतीय लोक दल का (हलधर किसान) पर सहमती बनी। समय कम, राजनैतिक दल एवं गतिविधियाँविहीन उम्मीदवार किस प्रकार चुनाव की तैयारी कर विजय प्राप्त करेंगे। यह प्रश्न जनमानस में गूंज रहा था। जैसे ही विरोधी नेताओं ने जनता के बीच में अपनी बात रखना शुरू की। धीरे-धीरे जनता संगठित होने लगी। ''लोग मिलते गए, कारवाँ बढ़ता गया'' इस प्रकार लोकसभा 1977 का चुनाव सम्पन्न हुआ। चुनाव में 9 प्रदेशों में कांग्रेस पूर्ण रूप पराजित हो गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी स्वयं एवं उनके पुत्र संजय गाँधी भी चुनाव हार गए। श्रीमती गाँधी के सलाहकार माखनलाल पोतेदार चौधरी बंशीलाल, विद्याचारण शुक्ल, आदि संजय गाँधी के साथियों ने सलाह दी कि चुनाव परिणामो को मानने से इन्कार कर दिया जावे तथा आपातकाल का लाभ उठाकर पुनः विरोधियों को जेल भेज दिया जावे। किन्तु देश की परिस्थितियो के जानकारों ने स्पष्ट कहा की यह संभव नहीं हैं। अंततः पराजय स्वीकार्य की गई। चुनाव परिणामों के उत्सुक नागरिक जब देश के अन्य भागों से चुनावों के संबंध में कांग्रेस उम्मीदवारों की जानकारी प्राप्त करने हेतु टेलीफोन करते तो उत्तर मिलता सब हार गए। दैनिक नईदुनिया ने लिखा - ''हारे-हारे और हारते चले गये....''
                               पूरे देश में जनमानस में अत्यंत उत्साह एवं खुशी का वातावरण था। जनता पार्टी को अपने औपचारिक गठन के पूर्व ही पूर्ण बहुमत प्राप्त हो गया था। देश में जनता ने घरों पर रोशनी कर दीपावली मनाई। काले कानून और गुलामी से मुक्ति पाई। श्री मुरार जी देसाई को देश का अगला प्रधानमंत्री मनोनीत किया गया। श्री मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल ने 24 मार्च, 1977 को शपथ ली। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने सत्ता से हटने के पूर्व, आपातकाल से संबंधित हजारों दस्तावेज नष्ट करवा दिये। ताकि ऐतिहासिक तथ्यों से देश की जनता एवं इतिहास अनभिज्ञ रहे। सत्ता से हटने के पूर्व पराजय के बाद श्रीमती गाँधी द्वारा आपातकाल हटाने की घोषणा की गई।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह चुनाव अभूतपूर्व एवं अद्भुत था।




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